अयोध्या

अयोध्या – मेरी नज़र से !

  • विनायक पाण्डेय 

अयोध्या,प्रथम बार जब यह शब्द अपने कर्णपटल पर गुंजित होता है तो वस्तुतः अंतर्मन में अपने आराध्य के प्रति एक विशिस्ट स्थान का रूप धारण कर लेती है। हिंदुत्व की आस्था का शाश्वत पुंज है अयोध्या,समूचे उर्वी पर स्थापित्व राजनीचारो के संहार का इकलौता विबुध है अयोध्या।सनातन संस्कृति को निर्बाध रूप से अनवरत गति प्रदान करने का बल सम्बल है अयोध्या।

सन 47 की ऐतिहासिक रात जब आत्मभू का विशिख एक कुसुम की भांति परतंत्र मा की गोद में ठिठोली लेते हुए समाहित हुई और तानाशाही फरमान को भीतरघात करते हुएआदेश आया की “जिसका मन हो वो पाक चला जाये” और वस्तुतः अधिकांश तथाकथित शांतिप्रिय अपने गंतव्य स्थान की ओर बढ़े,सिद्ध किया कि हिंदुस्तान हिंदुत्व का राष्ट्र है।

जिस राष्ट्र में शार्दुल के दन्त भी हँसते हँसते तोड़ दिए जाते,जहाँ वाक्,वागीशा, जनार्दन,जलधर, भूतेश ने साक्षात् खुद को उद्धरित क्र लिया उस देश में “अयोध्या” पर इतना विवाद क्यू?? विवाद शायद इसलिए की सनातन का सिपाही चिर निद्रा में चला गया या सरकारे अघोषित काल के आगोश में?

अयोध्या ने क्या कुछ नही सहा,गोलियों की आवाजें,रक्तरंजित सरयू का वेग,क्रन्दन चीत्कार,क्षत विक्षत शव,आतंकी गतिविधियां इत्यादि। धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष की आपाझापि के तमाम कसौटियों से गुजरी है अयोध्या,प्रतिदिन टूट रही है अयोध्या। परिवर्तन प्रकृति का नियम है,यदि वर्तमान सर्कार को प्रचंड बहुमत हम सनातनियो ने सौपा है तो उसमें निहित स्वार्थ को भी सर्कार पहचाने।

100 करोड के आराध्य को तंबू में देखने के लिए सिंघासन नही सौपा है।सिंघासन बरकार है ये अयोध्या की देंन है, न्यायिक प्रक्रिया में राजनीतिक हस्तक्षेप तब जायज़ हो जाता है जब मुद्दा आस्था से ताल्लुकात रखत हो।। ध्रुवनंदा एवं सूर्यतान्या के सलीलो के अद्भुत मिलान की भांतिउम्मीद की एक कर ने तटिनी की कोख से समृद्ध अयोध्या को जन्म दिया है।

अयोध्या आज लालायित है अपने आगारागमन हेतु,कुछ सपनो की पोटली को अपने रुदन में बांधे,वो चारदीवारी से लगाव वो अपनों का ताँता और लाखों की तादाद। लेकिन एक अजीब सी नीरवता बांधे अयोध्या आज शांत है,मनो सब कुछ छीन गया हो।।

 

 

 

 

 

 

 

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