एक याद बचपन की ओर

साक्षी गुप्ता 

 

बहुत याद आता है , वो बचपन का ज़माना

चिड़ियों की चहचहाहट , सुबह का ढिलासियाना ,

हर  काम आराम से करना ,फिर डाट खा जाना  ,

बहुत याद आता है , वो बचपन का ज़माना

वो तोतली ज़बान से पापा को बुलाना

दिन भर दोस्तों के साथ निर्भय होकर ढोलना

माँ के डांटने पर घर चले आना

बहुत याद आता है ,बचपन का वो ज़माना

वो छोटे से ढिलाने के लिए ज़िद्द कर लेना

साथियों के संग मेले में घूमने जाना

और फिर दोबारा  माँ  के साथ जाना

बहुत याद आता है ,वो बचपन का ज़माना

वो दादी माँ की कहानियों में हर रात खो जाना

उन परियों के फिर मीठे सपने देखना

माँ का डाँटना और पिता का पुचकारना

बहुत याद आता है   ………….

 

वो बारिश के मौसम में पकौड़ों की मस्ती

माँ का नाखुश होना और पिता की चुटकी

बातों ही बातों में फिर एक सा हो जाना

बहुत याद आता है……………..

 

चिंताओं से मुक्त वो बचपन की लोरी

सुनना बिना किसी डर के हर बात कह देना पर

पर छोटी सी बात पर चेहरा बना लेना

फिर कभी पापा से डरना , माँ से लड़ जाना

बहुत याद आता है , बचपन का वो ज़माना |

 

लेकिन ,

ना रहा अब वह बचपना और न रहा वो ज़माना

ना दिलों की नज़दीकियाँ , ना प्यार भरा ठिकाना

आज सभी गुमनाम हैं अपने ही धुन में

क्यूंकि मानते  हैं सब इसे रोकड़े का ज़माना

पर थक गया हूँ मैं माँ इस दुनिया की तपिश से

इस दौड़ भरी ज़िंदगी और स्नेह पर पड़ी धूल से

फिर से सवरना है मुझे तुम्हारा स्नेह पाकर

तुम्हारी ममता और प्यार की अभिभूति से

यह एक ऐसी दुनिया है माँ

जहाँ अपने ही अपनों के दुश्मन हैं

तो गैरों से क्या उम्मीद रखना

यह जगत है धोखे और लालच का

यहाँ प्यार की नींव कहाँ रखना

काश ! एक ऐसी सेतु होती

जिसका सहारा लेकर चला आता मैं

और कहता – यहीं रहा करता था मैं

यही है मेरे बचपन का ज़माना

बहुत याद आता है , वो बचपन का ज़माना ||

 

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