बापू

बापू और संघ

  • अर्पित चंसोरिया

महात्मा गांधी “बापू ” के बारे में पहली बात क्या सुनी थी? शायद ये कि वो राष्ट्रपिता हैं. मगर उनको कभी ये कहकर पुकारा नहीं. बापू कहते रहे. अब भी कहते हैं. बापू गांधी का पर्यायवाची बन गया. अब संबित पात्रा आए हैं. नई बात लाए हैं. कहते हैं, नरेंद्र मोदी देश के ‘बाप’ हैं. समझ नहीं आ रहा कि पात्रा झोंक में कह गए कि सच में ऐसा मानते हैं? इतनी फूहड़ बात कोई खुलेआम कैसे बोल सकता है? खैर, संबित पात्रा बीजेपी के प्रवक्ता हैं. बीजेपी की सरकार है. मतलब, पात्रा कोई ऐरे-गैरे नहीं हैं. उन्होंने मोदी को देश का बाप कहा है तो शायद होंगे मोदी बाप. बाप बनना मुबारक हो उनको. उनको एक बात साफ कर देनी चाहिए मगर. क्या संघ ने भी मोदी जी को ‘देश का बाप’ मान लिया है?

मैंने कई बार संघ के मंच पर सुना है. उनको ‘राष्ट्रपिता’ संबोधन से बड़ी आपत्ति होती है. कहते हैं, भारत तो खुद हमारी मां है. इस देश का कोई पिता कैसे हो सकता है? वो भी ऐसा इंसान, जिसने इस मिट्टी पर जन्म लिया. राष्ट्रपिता से इतनी दिक्कत है तो क्या ‘मोदी देश का बाप है’ से दिक्कत नहीं होगी? किसी प्रधानमंत्री को देश का बाप बताना तो और भी आपत्तिजनक होना चाहिए. मोदी प्रधानमंत्री हैं तो आज पात्रा उनको ‘देश का बाप’ कह रहे हैं. कल को कोई और प्रधानमंत्री बनेगा, तो क्या वो भी ‘देश का बाप’ बन जाएगा? मतलब, हर पांच साल में देश को नया बाप मिलेगा? तो फिर क्यों न प्रधानमंत्री के पद का नाम बदलकर ‘देश का बाप’ कर दिया जाए. बीजेपी की ही सरकार है. उसे जल्द से जल्द संविधान में संशोधन करके ये बदलाव कर देना चाहिए. फिर सब मान लेंगे मोदी जी को ‘देश का बाप’

मगर एक बात संबित पात्रा को याद रखनी चाहिए. वो मोदी को ‘देश का बाप’ कह सकते हैं, मगर बापू नहीं बना सकते. बाप और बापू में बड़ा फर्क होता है. बस एक ‘ऊ’ का नहीं, फर्क बड़ा गहरा होता है.
बाप माने?

‘मैं तेरा बाप हूं’. ‘बाप है वो तेरा’. ये जब कोई कहता है तो एक किस्म की दादागिरी महसूस होती है. हिंदी फिल्मों में गुंडई करते वक्त खुद को औरों का ‘बाप’ बताने की बड़ी लंबी आदत रही है. एक किस्म की जबरदस्ती है इस शब्द में. खुद को औरों का बाप बताना ओछे लोगों की आदत होती है. ऐसे लोग, जो दूसरों को उनकी ‘औकात’ दिखाने के लिए खुद को उनका बाप बताते हैं. किसी पर हावी होने के लिए कहते हैं, मैं तेरा बाप हूं. आपने संबित पात्रा को ये बोलते सुना है? नहीं, तो सुनिए. अकड़ है उनकी आवाज में. जैसे कह रहे हों, मोदी बाप लगता है तुम सबका. उनके अंदाज में एक किस्म का छिछलापन था. गुंडई थी. बदतमीजी थी. घमंड था. अकड़ थी. ये सब जो था, वो ही ‘बापू’ और ‘बाप’ का अंतर है.

बापू माने?

बापू में कितना प्यार है. बोलकर देखिए. महसूस होगा. बड़ी सादगी है इस संबोधन में. एक किस्म की अनौपचारिकता है. कोई आडंबर नहीं है. ये संबोधन उस शख्स का था, जिसकी एक बात पर तैंतीस करोड़ जनता पीछे-पीछे चल पड़ती थी. वो शख्स, जिसके विरोधी भी उसकी इज्जत करते थे. ऐसा नेता, जिससे लोग मुहब्बत करते थे. ऐसा नेता, जो लोगों को पिता जैसा स्नेह देता था. उंगली थामकर चलना सिखाता था. उनकी गलतियों का प्रायश्चित खुद करता था. गांधी ने बहुत प्यार कमाया था. लोगों की ममता जुड़ी थी उनसे. उन्हें लेकर लोग भावुक हो जाते थे. वो इंसान दंगे के बीच निडर होकर घूमता था. नंगे पांव. लाठी थामे. नफरत में अंधे इंसान उसकी आंखों की लाज करते. उसके सामने सिर झुका देते. कोई जबरदस्ती नहीं थी, बस उसके सामने कोई उसका दिल नहीं दुखा पाता था.

बापू, जिनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था. जिसने अपने बच्चों से कहीं ज्यादा प्यार इस देश के लोगों से किया. जो लोगों के बीच जाता. उनके जैसा ही जीवन जीता. इतनी सादगी थी उस इंसान में कि एक औरत को अधनंगा देखकर उसे अपने बदन पर पड़े कपड़ों पर अफसोस होने लगा. फिर जीवन भर अधनंगा ही रहा वो. अधनंगा फकीर. हिंदुस्तान के लोगों ने गांधी से जितना प्यार किया, उतना फिर शायद कभी किसी से नहीं किया. उन्हें बापू कहना उसी मुहब्बत की निशानी है. सादगी से भरे उस शख्स का सादा सा संबोधन.

संबित पात्रा के लिए दो शब्द:-
संबित जी, प्रवक्ता का काम बड़ा मुश्किल होता है. दिनभर बोलना. दिनभर अपनी तारीफ करना. गलत बात को भी सही साबित करने की कोशिश करना. अड़े रहना. गलती नहीं मानना. बहुत मुश्किल ड्यूटी है. मगर यूं आपा खोकर जो अपनी और पार्टी की किरकिरी कराए, वो ‘सेल्फ गोल’ दाग रहा होता है. जैसे कहते हैं न कि इनके जैसा दोस्त हो तो दुश्मनों की क्या जरूरत. वो सब देख लीजिएगा. नफा-नुकसान टटोल लीजिएगा.

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